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लिखने-पढ़ने वालों, तथा समझने-बोलने वालों के सामने प्रायः भाषा का सवाल उठता रहता है। ऐसे प्रश्न खासकर लेखकों, कवियों, पत्रकारों, उद्घोषकों, वक्ताओं, गायकों, नाट्यकर्मियों एवं शिक्षकों को गहन विचार करने का आमंत्रण देते रहते हैं। बावजूद इसके हममें से अधिकांश इसे अनावश्यक मानकर इससे कन्नी कटाते रहते हैं। जाहिर है समाज में प्रत्येक व्यक्ति भाषाविद् नहीं हो सकता। मगर यह उनसे अपना सरोकार तो रखता ही है, जिनकी रोजमर्रा की जिंदगी का ताना-बाना लिखने और बोलने से ही बुना जाता है. यह समस्या किसी भी भाषा की बोली और आलेख में दिख सकती है। भाषा अपनी मातृभाषा हिन्दी इससे प्रायः कुछ ज्यादा ही ग्रस्त दिखती है। भाषा में व्याकरण का बहुत महत्व है- जिसमें वर्तनी, उच्चारण और ध्वनि पर विशेष ध्यान जरुरी हो जाता है। इसीलिए प्रायः लिखने की शुद्धता बोलने की शुद्धता का पैमाना बन जाती है। उन भाषाशास्त्रियों की राय से भी सहमत कदाचित हुआ जा सकता है कि ''जो लिखिए, सो बोलिए अथवा जो बोलिए, सो लिखिए'' यदि इसे भी थोड़ी देर के लिए फार्मूले के तौर पर आजमाएं तो भी हमारे लेखन और वाचन दोनों में निश्चित रूप से सुधार आ सकता है। बोलने में ध्वनिशास्त्र कते पालन की अनिवार्यता होनी चाहिए।
बीबीसी हिन्दी सेवा में सम्मानित पूर्व उद् घोषक कुरबान अली से अपने संक्षिप्त मुलाकात की अवधि में मुझसे उसी की टांग तो़ड़े जाने की थोड़ी चर्चा हुई। उनके मन की वाजिब पीड़ा से मैं सहमत हूं। उर्दू भाषा के शब्दों के उटपटांग गलत उच्चारण से कुछ का कुछ अर्थ निकाला जा सकता है। नुख्ते के हेर-फेर से खुदा-जुदा हो जाता है। ठीक वैसे ही किसी भी भाषा के शब्दों के अशुद्ध उच्चारण से उसकी संप्रेषणीयता पर प्रश्नचिन्ह खड़ा हो जाता है। हालांकि मैं कोई भाषाविद् नहीं हूं, न ही भाषाशास्त्र की औपचारिक-अनौपचारिक शिक्षा ही ग्रहण की है, तथापि मेरा मानना है कि इस विषय पर विमर्श आवश्यक है। climate difference के कारण स्वर-व्यंजन के उच्चारण और उनसे उत्पन्न ध्वनियों का अंतर चर्चा का एक दूसरा विषय हो सकता है। मगर ऐसा एक खास वर्ग है जिसे अति प्रबुद्ध माना जाता है जो शिक्षा, पत्रकारिता, प्रशासन आदि क्षेत्रों से जुड़े होते हैं। उनसे आम आदमी विशिष्ट भाषा-प्रयोग की अपेक्षा रखता है। संभवतः उनकी बोलचालक की दक्षता, दोष-रहित भाषागत कुशलता उन्हें विशिष्टता प्रदान करती है और निस्संदेह वे इसी रूप में आम से खास बन जाते हैं....(क्रमशः)

2 comments:

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आरंभ ‘अंतरजाल में छत्तीसगढ का स्पंदन’

11 July 2008 at 20:20  

भाषा दो स्तरों पर काम करती है। आम बोलचाल की भाषा में सब कुछ चलता है लेकिन जो कार्य एवं व्यवसाय भाषा पर ही टिके हैं उनमें उसकी शुद्धता और शुचिता का ध्यान रखा जाना बेहद ज़रूरी है। क्योंकि उनकी भाषा दूसरों को भी प्रभावित करती है। यदा कदा मतान्तरः एक राजनीतिक ब्लॉग भी पढ़ते रहें।

12 July 2008 at 12:31  

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